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कौन हैं सुप्रीम कोर्ट में वकील के भेष में जज पर पेपर उछालने वाले प्रबल प्रताप? लड़की के कारण गई थी नौकरी

 


नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट में एक नियमित सुनवाई उस समय अचानक चर्चा का विषय बन गई, जब एक याचिकाकर्ता ने अदालत के भीतर ऐसा व्यवहार किया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। वकील की पोशाक में मौजूद याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर न्यायाधीशों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किया, अदालत की कार्यवाही के दौरान अपनी फाइल के लगभग 185 पन्ने हवा में उछाल दिए और स्वयं को "संप्रभु" बताते हुए अदालत को निर्देश देने की कोशिश की। स्थिति इतनी असामान्य हो गई कि सुरक्षा कर्मियों को तत्काल हस्तक्षेप कर उसे कोर्ट रूम से बाहर ले जाना पड़ा।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर माना, लेकिन संबंधित व्यक्ति की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसके खिलाफ तत्काल दंडात्मक कार्रवाई नहीं की। इसके साथ ही अदालत ने उसकी याचिका को पूरी तरह निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।

सुनवाई के दौरान अचानक बदल गया माहौल

यह मामला न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। प्रारंभिक सुनवाई सामान्य तरीके से शुरू हुई, लेकिन कुछ ही देर बाद याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप यादव का व्यवहार असामान्य होने लगा।

बताया गया कि उसने अदालत के समक्ष लखनऊ के विकासनगर क्षेत्र के एसीपी के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने की मांग रखी। जब न्यायाधीशों ने उससे पूछा कि क्या वह अदालत को आदेश दे रहा है, तब उसने स्वयं को "संप्रभु" बताते हुए अपनी मांग दोहराई।

पीठ द्वारा कानूनी प्रक्रिया समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन उसने अपनी बात पर अड़े रहते हुए कथित रूप से अदालत की गरिमा के विपरीत भाषा का प्रयोग किया।

कोर्ट रूम में उड़ाए 185 पन्नों के दस्तावेज

सुनवाई के दौरान अचानक याचिकाकर्ता ने अपने पास मौजूद लगभग 185 पन्नों की फाइल को हवा में उछाल दिया। देखते ही देखते कोर्ट रूम में कागज बिखर गए।

इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से कुछ क्षणों के लिए अदालत का वातावरण पूरी तरह बदल गया। सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत स्थिति संभाली और संबंधित व्यक्ति को अदालत कक्ष से बाहर ले जाया गया ताकि न्यायिक कार्यवाही बाधित न हो।

घटना के बाद अदालत की कार्यवाही सामान्य रूप से आगे बढ़ाई गई।

अदालत ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि न्यायालय की गरिमा सर्वोच्च है और अदालत के भीतर इस प्रकार का व्यवहार स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि पीठ ने यह भी माना कि उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए संबंधित व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर भी विचार किया जाना चाहिए। इसी कारण उसके खिलाफ तत्काल अवमानना या अन्य दंडात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई।

लेकिन अदालत ने उसकी याचिका को कानूनी आधारहीन बताते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया।

नौकरी से शुरू हुआ पूरा विवाद

जांच में सामने आया कि प्रबल प्रताप यादव पहले लखनऊ की एक निजी सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत था।

कंपनी के अनुसार, उस पर अपनी एक मुस्लिम महिला सहकर्मी को कथित रूप से आपत्तिजनक ईमेल भेजने और लगातार परेशान करने के आरोप लगे थे। कंपनी ने पहले उसे चेतावनी दी थी, लेकिन व्यवहार में सुधार नहीं होने के कारण अंततः उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

नौकरी समाप्त होने के बाद उसने कंपनी के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की।

कंपनी पर लगाए गंभीर आरोप

सेवा समाप्त होने के बाद प्रबल प्रताप यादव ने कंपनी पर गंभीर आरोप लगाए। उसने दावा किया कि कंपनी देश विरोधी गतिविधियों में शामिल है और उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए।

इसी मांग को लेकर उसने अलग-अलग अदालतों का दरवाजा खटखटाया।

मजिस्ट्रेट कोर्ट से शुरू हुई कानूनी प्रक्रिया

नवंबर 2025 में उसने लखनऊ की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) अदालत में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत आवेदन प्रस्तुत किया।

उसने अदालत से कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने और विस्तृत जांच कराने की मांग की।

सीजेएम अदालत ने मामले में पुलिस से रिपोर्ट मांगी।

पुलिस रिपोर्ट के बाद बदला मामला

पुलिस की रिपोर्ट आने के बाद अदालत ने पाया कि मामले को सीधे एफआईआर के रूप में दर्ज करने के बजाय निजी शिकायत (कम्प्लेंट केस) के रूप में आगे बढ़ाया जाना अधिक उपयुक्त होगा।

इसके बाद मजिस्ट्रेट अदालत ने उसी आधार पर आगे की सुनवाई शुरू कर दी।

लेकिन याचिकाकर्ता इस निर्णय से संतुष्ट नहीं हुआ।

हाईकोर्ट भी पहुंचा मामला

सीजेएम अदालत के फैसले के खिलाफ उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में याचिका दाखिल की।

उसने मांग की कि पुलिस को कंपनी के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाए।

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि जब विवाद पहले से निचली अदालत में विचाराधीन है तो वहीं उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी।

फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद प्रबल प्रताप यादव सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

इसी याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत में वह विवादित घटनाक्रम सामने आया जिसने पूरे मामले को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया।

लखनऊ पुलिस ने क्या जानकारी दी?

लखनऊ की पुलिस उपायुक्त (पूर्वी) डॉ. दीक्षा शर्मा ने बताया कि प्रबल प्रताप यादव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के भरथना क्षेत्र का निवासी है।

वह लखनऊ के जानकीपुरम क्षेत्र में किराये पर रहकर एक निजी सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्य करता था।

पुलिस के अनुसार, नौकरी समाप्त होने के बाद उसने अदालत में आवेदन देकर एफआईआर दर्ज कराने की मांग की थी और मामला क्रमशः मजिस्ट्रेट अदालत, हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद वह लखनऊ वापस नहीं लौटा और दिल्ली में ही रह रहा था।

अदालत में अनुशासन क्यों है जरूरी?

भारतीय न्यायपालिका में अदालत की कार्यवाही निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार संचालित होती है। प्रत्येक पक्षकार को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया जाता है, लेकिन अदालत की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी होती है।

किसी भी प्रकार का अभद्र व्यवहार, न्यायाधीशों के प्रति असम्मानजनक भाषा या न्यायिक प्रक्रिया में व्यवधान न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित कर सकता है।

इसी कारण अदालतें ऐसे मामलों को गंभीरता से लेती हैं।

मानसिक स्थिति पर भी दिया गया महत्व

इस मामले की एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल अनुशासनात्मक पहलू ही नहीं देखा, बल्कि संबंधित व्यक्ति की मानसिक स्थिति को भी ध्यान में रखा।

अदालत ने माना कि यदि किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति सामान्य नहीं है तो न्यायिक निर्णय लेते समय मानवीय दृष्टिकोण अपनाना भी आवश्यक है।

इसी कारण तत्काल दंडात्मक कार्रवाई से परहेज किया गया, जबकि याचिका को कानूनी आधार न होने के कारण खारिज कर दिया गया।

न्यायपालिका का स्पष्ट संदेश

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि अदालत में असहमति व्यक्त करने या न्याय मांगने का अधिकार सभी नागरिकों को है, लेकिन यह अधिकार केवल संवैधानिक और कानूनी दायरे में रहकर ही प्रयोग किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के माध्यम से यह संदेश दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान सर्वोपरि है। अदालत की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता, वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका मानवीय परिस्थितियों और मानसिक स्वास्थ्य जैसे पहलुओं को भी संवेदनशीलता के साथ देखती है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला न्यायालयों में अनुशासन, संवैधानिक मर्यादा और न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान के महत्व को रेखांकित करता है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि अदालतें कठोरता और संवेदनशीलता—दोनों के बीच संतुलन बनाकर निर्णय लेने का प्रयास करती हैं।

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